बुधवार, 21 जून 2017

पच्चीसवीं किस्तः बाल क्लब की मस्ती और आपसी सद्भाव

हराईच का घंटाघर कई मायनों में काफ़ी अलग हटकर था। अंग्रेजों के समय के इस भव्य घंटाधर की छटा, विशेषकर शाम को खूबसूरत पेड़ पौधों, फूलों और रंगीन फव्वारे के साथ देखते ही बनती थी। बड़े से पार्क के बीच बना भव्य और कलात्मक घंटाघर खासा आकर्षण का केंद्र था। पार्क के आजू-बाजू भीड़-भाड़ वाले बाज़ार इसके आकर्षण को और भी बढ़ाते थे। यह पार्क हमारे घर और भव्य जयहिन्द कोठी से कुछ ही दूरी पर था। घंटाघर पार्क के मंच पर होली जैसे त्यौहारों पर मुख्यतः लखनऊ के आर्केष्ट्रा के साथ भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम और उसमें मेरे गानों का यार-दोस्तों और अन्य बहराईच वासियों को खासा इंतज़ार रहता था। साथ ही इसी मंच पर अक्सर देश भर के अनेक नामी गिरामी कवियों का भी जमावड़ा होता था

घंटाघर के शीर्ष पर लगी भव्य घड़ी के घंटों की गूंज दूर तक सुनाई देती थी। अत्यन्त पुरानी वह घड़ी जब कभी खराब होती तो उसके लिये बाहर से कारीगर बुलाये जाते। घड़ी ठीक करने और किन्हीं अन्य कार्यों के चलते एक बार एक अधेड़ मुस्लिम कारीगर का भी वहां कुछ समय के लिये आना हुआ था। उन्हें बच्चों से विशेष लगाव था अतः कुछ ही दिनों में उन्होंने वहां एक बाल क्लब की स्थापना कर डाली थी। प्रत्येक शाम को पार्क में आसपास के विभिन्न जाति धर्मों के बहुत सारे बच्चे इकट्ठा होते और उनके कुशल निर्देशन में अनेक शारीरिक व्यायाम टाइप तथा मनोरंजक खेलों को अंजाम दिया जाता। उनकी शिक्षाप्रद, आपसी सद्भाव और प्रेरणा से भरी बातें तथा बच्चों के प्रति प्रेम-व्यवहार भी ऐसा था कि बच्चे उनके मोहपाश में बंधते चले गये थे। मेरे दोस्तों में उन दिनों शाहिद, अशोक, रवि, रमेश, कमल, अजय, सुरेश और हरीश आदि काफी करीबी हुआ करते थे। 

उन्हीं दिनों मेरे पड़ोसी मित्र अशोक के शिवा नामक एक कज़न से भी मेरी अच्छी भली जान-पहचान हो गई थी। वह लखनऊ से हर बार गर्मी की छुट्टियों में अपनी मौसी के यहां आया करता था। तब लखनऊ मेरा पसंदीदा शहर हुआ करता था। और लखनऊ के लोग मेरे लिये बेहद महत्वपूर्ण भी होते थे। अतः एक ओर लखनऊ के आकर्षण तो दूसरी ओर शिवा के बातचीत और व्यवहार के लखनवी अंदाज़ ने मुझे शीघ्र ही उसका मुरीद बना दिया था। वह भी मेरी गायकी से प्रभावित होकर मेरा खास दोस्त बना गया था। वह जब कभी थोड़े समय के लिये भी बहराईच आता मुझसे मिले बिना नहीं रह पाता। हम साल भर की छूटी हुई कही-अनकही बातें उन्हीं गर्मी की छुट्टियों में एक दूसरे के साथ शेयर करके निपटाते थे। 

जिस वर्ष गर्मी की छुट्टियों में घंटाघर के पार्क में बाल क्लब की स्थापना हुयी थी, उस वर्ष शिवा और हम सभी दोस्तो ने नये-नये खेलों के साथ हर शाम को आपसी प्रेम-भाईचारे के साथ खूब इंजाय किया था। परन्तु बाल क्लब के संस्थापक के काम ख़त्म कर वापस अपने शहर जाते ही घंटाघर और बाल क्लब की रौनक गुम होकर रह गई थी। उनके जाने के बाद फिर किसी ने हम बच्चों की सुधि भी नहीं ली थी और हमारे लिए घंटाघर भी वीरान होकर रह गया था ।


21 जून,2017 (शेष अगली क़िस्त में)

शनिवार, 20 मई 2017

चौबीसवीं किस्तः बहराइच से मोतिहारी तक.

पने ननिहाल के प्रति प्रेम और मोह किसमें नहीं होता। विशेषकर तब के हमारे बचपन में तो यह कहीं अधिक ही होता था। यही वजह थी कि गर्मी की छुट्टियाँ होते ही हमारा मन अपने ननिहाल; मोतिहारी (चंपारण, बिहार) जाने को बेताब हो उठता। वही चंपारण, जिसके सत्याग्रह को भारत की जंगे-आजादी के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। कहना न होगा कि 15 अप्रैल,1917 को इसी आंदोलन के चलते भारतवासियों ने मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ के तौर पर पहचाना और यह भी कि  इसी चंपारण से महात्मा गांधी, अहिंसा को एक कामयाब विचार के रूप में रोपने में सफल हुए थे। 


मोतिहारी में हमारी आधा दर्जन के करीब एक से बढ़कर एक खूबसूरत और अत्यधिक पढ़ी-लिखी मौसियां थीं, जो हमारे लिये अपनी माँ-सी ही थी। उनकी गोद और छांव में हमने अनेक किस्से-कहानियों का आनन्द भी उठाया था। नाना जी के आकस्मिक स्वर्गवास के बाद उनके द्वारा छोड़ी गई चल-अचल सम्पत्ति के दम पर और अपनी सूझबूझ से ही नानी ने ही उन्हें पढ़ा-लिखाकर किसी लायक बनाया था, और इतने बड़े कुनबे को संभाला था। मौसियों की शादी के समय भी हम दल बल सहित अपने ननिहाल में अवश्य मौजू़द रहते थे। बहराइच से मोतिहारी तक की टुकड़ों में बंटी सुविधाहीन अनारक्षित लम्बी और कठिन बस और रेल की यात्रा भी ननिहाल जाने के उत्साह में उन दिनों कभी हमें उबाऊ या दुरूह नहीं लगी। और आज की एसी और सुविधा संपन्न आरक्षित यात्रा से कहीं अधिक लुत्फ हम अपनी भाप वाले इंजन की छुक-छुक करती उस यात्रा में भाई-बहनों और माता-पिता के साथ उठा लेते थे।



मोतिहारी में बड़ी मौसी के हमारे आस-पास की उम्र के बच्चे; रीता दीदी, राकेश भैया, मधु और बबलू आदि तब हमारे खास दोस्त हुआ करते थे। और एक दूसरे के प्रति हमारी दीवानगी देखते ही बनती थी। गर्मियों की छुट्टियों में धूप में ही हम दूर दूर तक फैले अपने खेत, खलिहान पर तितलियों के पीछे खूब दौड़ लगाते। ऐसे ही रात में हम जुगनुओं के आगे-पीछे चक्कर काटते।  कभी हम नाना जी के हिस्से की नदी के किनारे इकट्ठे होकर मछली, घोंघे या केंकड़े बटोरते। आज बेशक एक चींटी मारने में भी हमें दर्द होता हो और हम जीव-जन्तु हितैषी होते हुए पूर्णतः शाकाहार अपना चुके हों पर तब कैसी भी मछली, झींगा, घोंघा, केकड़े आदि तक आग में ऐसे ही पकाकर निगल जाने में हमें तनिक भी झिझक महसूस नहीं होती।

बाल्यावस्था में जब हम अंतिम बार बहराइच से मोतिहारी अपने ननिहाल गये थे, तब वापसी के समय हम सभी भाई-बहन अपनी नानी, मौसियों और मौसेरे भाई-बहनों आदि से लिपट-लिपट कर बहुत रोये थे। यही नहीं चलते वक़्त हम ननिहाल की दरों-दीवारों से भी खूब लिपटे थे और उन्हें बार-बार चूमते रहे थे। शायद हमें इस बात का आभाष था कि बढ़ती उम्र और पढ़ाई-लिखाई की व्यस्तताओं के चलते या अत्यधिक बूढ़ी हो चुकी नानी के न रहने पर हमारा ननिहाल आना जाना उस रफ्तार से नहीं हो पायेगा जैसे पिता जी के चलते उन दिनों हो जाता था। 


20 मई,2017 (शेष अगली किस्त में)


मंगलवार, 28 जून 2016

तेइसवीं किस्तः देश भक्ति का नशा

देश प्रेम हमारे भीतर बचपन से ही कूट कूट कर भरा हुआ था। तब हमें गली मोहल्ले के सभी लोग बस पक्के भारतीय ही लगते थे। हिन्दू-मुस्लिम के भेद से हम सभी बच्चे तब अंजान होते थे। शाहिद, इदरीस आदि उस समय हमारे प्रिय लंगोटिया यारों में से हुआ करते थे। जितनी उन्हें हमारी होली की गुजिया भाती उतनी ही हमें उनकी ईद की सेंवइयां भी। अक्सर हम अपनी जेब के पैसे बचाकर या बड़े-बूढ़ों से थोड़ा बहुत चंदा मांग-मांग कर घर के अहाते में ही पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व भी मना लेते थे। उस दिन हम कुछ बच्चों को इकठ्ठा कर विभिन्न ज्ञानवर्द्धक प्रतियोगितायें भी आयोजित करते और फिर हम उम्र बच्चों को काॅपी-पेंसिल उपहार में बांटते हुए समारोह का समापन करते।

हमारे हिन्दी के मास्टर जी हमारी देश प्रेम की भावनायें अच्छी तरह से समझते थे, यही वजह थी कि क्लास में अक्सर खाली समय में वह मुझसे कोई देश भक्ति का गीत अवश्य सुनते थे। उस समय प्रायः मास्टर जी मुझसे सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा लिखा गया गीत ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाॅसी वाली रानी थी...’ सुनाने को कहते। तब मैं पूरी तरह से मदमस्त होकर वह गीत सुनाता और मास्टर जी सहित सभी सहपाठी भाव विभोर होकर रह जाते।

यह गीत गाते समय मुझे कुछ ऐसा महसूस होता मानों मैंने खुद भी कभी रानी झाँसी की सेना में रहते हुए उनके साथ ही अंग्रेजों से लोहा लिया हो। और  हाँ, उस समय यह

गीत गाते हुए हमें इस बात का रंच मात्र भी आभाष नहीं होता था कि यह गीत गाते गाते पिता जी के ट्रांस्फर के चलते हम कभी बहराइच छोड़कर सीधे लक्ष्मीबाई के नगर ‘झाँसी’ में ही जा बसेंगे।’

28 जून,2016 (शेष अगली किस्त में)

मंगलवार, 3 मई 2016

22वीं किस्तः छोटे कलाकारों से परहेज़

हराइच में तब दो ही सिनेमा हाल हुआ करते थे। ओंकार टाकीज़ तो हमारे घर के एकदम बगल में ही था पर हरी टाकीज़ घर से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर स्थित था। उस समय फिल्मों के प्रचार का तरीका भी कुछ अलग हटकर हुआ करता था। किसी भी नई फिल्म के शहर में आने पर तांगे पर उसका पोस्टर लगाकर पूरे शहर में उसका प्रचार किया जाता था। फिल्म के गानों के साथ-साथ, बीच-बीच में एनाउंसमेंट भी चलता रहता था। तांगे के पीछे भागते हम जैसे उत्पाती बच्चों के बीच पर्चे बांटकर भी फिल्मों का प्रचार किया जाता था। सिनेमा हाल तक दर्शकों को खींचने के लिये अक्सर बाहर से कुछ छोटे-मोटे पेशेवर कलाकार बुलाये जाते थे। और फिल्म के बीच-बीच में उनके डांस और गानों के कार्यक्रम भी चलते रहते थे। कई बार तो परदे के आगे छोटे-बड़े पशुओं की कलाकारी भी देखने को मिल जाती थी। निश्चय ही इनसे फिल्म देखने वालों की संख्या कुछ न कुछ ज़रूर बढ़ती थी। घर में भी हमें कलाकारी का कुछ शौक था अतः ऐसे समय हम भी सिनेमा हाल के बार-बार चक्कर लगाते रहते थे। 

अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों की एक झलक पाने के लिये हम ठण्ड, गर्मी या घूप की भी परवाह नहीं करते थे। और उनके ठहरने के स्थान पर निरन्तर चक्कर लगाते रहते थे। घर में कलाकारी का माहौल होने के बावजू़द नाते-रिश्तेदारों को यह सब ज़्यादा पसंद नहीं था। दरअसल उस वक्त थियेटर के छोटे-मोटे कलाकारों/डांसरों आदि को आज की तरह बहुत अधिक सम्मान भी नहीं प्राप्त था। आसपास के लोग या समाज क्या कहेगा के चक्कर में घर वाले हमें उनके ज़्यादा नज़दीक भी नहीं जाने देना चाहते थे। इसके विपरीत मेरे और मुन्ना भैया के ऊपर फिल्म और उन कलाकारों का, बेश कवे छोटे ही रहे हों; नशा हर वक्त छाया रहता था। 

एक बार जब ऐसे ही कुछ कलाकार ओंकार टाकीज में अपनी कला का प्रदर्शन करने आये हुए थे तब बार-बार उनके चक्कर लगाने से मुन्ना भैया की उनसे खासी पहचान हो गई थी। और उस दिन तो मुन्ना भैया और मेरी खुशी का ठिकाना ही न रहा जब उनमें से एक बेहतरीन डांस कलाकार हमारे आग्रह पर हमारे घर तक चला आया था। किसी अपरिचित और छोटे डांस कलाकार को घर के दरवाजे पर देखकर पडौसियों में तो काना फूसी हुई ही घर के लोग भी किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा-से गये। 

मुन्ना भैया ने उस कलाकार को घर के भीतर बैठालने या उसकी आवभगत करने की कोशिश की पर सफल नहीं हो सके। लोक-लाज़ के डर से उसे घर के भीतर लाने की अनुमति नहीं मिल सकी और अंततः बेचारे कलाकार को अपमानित सा होकर वापस जाना पड़ा। 

हमें काफी समय तक उस कलाकार का यह अपमान सालता रहा था क्योंकि हम खुद कला क्षेत्र से जुड़े हुए थे और हम कला तथा कलाकारों के कद्रदान भी काफी थे। 

3 मई,2016 (शेष अगली किस्त में)

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

इक्कीसवीं किस्तः दीवाला नहीं दीवाली

जी हाँ? कम आय और सीमित साधनों के बीच भी तब केे त्यौहारों पर दीवाला नहीं निकलता था बस प्यार और सद्भाव में डूब कर सबके दिल हिलते-मिलते नज़र आते थे। 

सच! क्या कहने थे बचपन की उस दीवाली के। महीने भर पहले से मिलजुल कर घर की साफ सफाई, रंग रोगन और सजावट। बाज़ार तब भी मिठाइयों और खेल खिलौनों की सजावटी दुकानों से अटे पड़े रहते थे परन्तु उन मिठाइयों और खिलौनों में चीनी (चाइनीज़) की बजाय गुड़ की सुगंध और मिट्टी की सोंधी महक ही नज़र आती थी। बहराइच के घंटाघर से लेकर पूरा चौक बाज़ार दुकानदारों और खरीदारों की भीड़ से भरा होता।

हमारे घर में अक्सर दीपावली पर कोई बड़ा (उस समय के लिहाज़ से) सामान, जैसे नया सोफा सेट या बड़े आकार का रेडियो आदि ज़रूर आता और जब वह सामान कुछ समय के लिये भी घर के बाहर अहाते में रखा होता तो उधर से गुज़रने वाले उन्हें निहारे बगैर नहीं रह पाते। और कइयों के मुख से तो तब बरबस यही निकलता...‘हाय..इत्ता बड़ा सोफा सेट...हाय इत्ता बड़ा रेडियो’...। निश्चय ही कुछ लोगों के लिये तब वह अजूबे जैसा ही होता था।

हमारे घर के सामने ही बच्छराज-बाबूलाल (कपड़ों के व्यापारी) की बड़ी सी आकर्षक कोठी थी और बगल में ही भव्य और आलीशान जयहिन्द कोठी। उन सभी कोठियों पर दीपावली के अवसर पर ऊपर से नीचे तक दीपमालाओं की सजावट देखते ही बनती  थी। और जब रात्रि में वहाँ सार्वजनिक रूप से पटाखों और फुलझडि़यों का ग्रांड शो शुरू होता तब उनसे घर के लोगों के साथ ही आसपास के छोटे-मोटे (जो पैसों की तंगी के चलते पटाखे नहीं खरीद सकते थे) लोगों का भी भरपूर मनोरंजन होता। तब हम पटाखों के शोर से प्रदूषण बढ़ने के खतरों से भी अंजान रहते।

.....पर आम दिन हो या कोई तीज-त्यौहार मेरी शरारतें और पिटाई के मौके कम होने को नहीं आते। एक बार मुझ बालक ने कहीं किसी से सुन लिया कि दीवाली पर पुराने खिलौने बेंचने से लक्ष्मी जी घर में नये-नये खिलौने और मिठाइयां लेकर  आती हैं, तो इस मुए के दिमाग में बात भीतर तक बैठ गई। अब घर वालों से तो इसकी इजाज़त मिलनी नहीं थी सो खुद ही मुन्ना भैया की अगुवाई में कुछ अपने जैसे छंटे हुए दोस्तों के साथ चुपके से घर के पुराने खिलौने इकट्ठे कर डाले। और घर के बाहर ही फुटपाथ पर लगी दुकानों के बीच एक चद्दर बिछाकर बैठ गये, खिलौने बेंचने।

एक दोस्त ‘सस्ते खिलौने ले लो...सस्ते खिलौने ले लो’ की आवाज़ें लगाता जा रहा था और मैं सभी आने-जाने वाले राहगीरों को ललचाई नज़रों से घूरे जा रहा था। अलबत्ता मुन्ना भैया गद्दी संभाले हुए थे। पर नाश हो आवाज़ लगाने वाले उस पापी दोस्त का। ससुरे की आवाज़ ग्राहकों तक पहुंची हो या न पहुंची हो मेरे मम्मी-पापा तक अवश्य पहुंच गई थी। और फिर वही हुआ जो होना चाहिये था। मुन्ना भैया और दोस्त लोग तो भनक पाकर खिसक लिये पर खिलौना बेंचते हुए रंगे हाथों पकड़ा मैं ही गया और फिर मेरी दीपावली तो सार्वजनिक रूप से मननी ही थी।

......उन दिनों त्यौहारों पर लम्बी छुटिटयों के चलते देर रात तक त्यौहार मनाने के बाद अगले ही दिन सुबह- सुबह स्कूल या दफ्तर जाने की  फिक्र भी नहीं होती थी। और दीपावली से भैया दूज/कलम-दवात पूजा तक कागज़, कलम को हाथ न लगाने वाले त्यौहारी नियम-शर्तों के चलते, लिखने-पढ़ने की छूट भी होती थी। ऐसे में त्यौहार का मज़ा कुछ और ही बढ़ जाता था....। 

दीपावली 11 नवम्बर,2015  (शेष अगली किस्त में) 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

बीसवीं किस्तः ऊँचे इरादों का जनाज़ा

न दिनों कक्षा 8-9 की पढ़ाई के दौरान ही पत्र-पत्रिकायें और बाल पाॅकेट बुक्स पढ़ते-पढ़ते मेरे भीतर का लेखक भी अंगड़ाइयां लेने लगा था। यद्यपि मेरे मझले भैया मुन्ना जी पहले से ही छुटपुट लेखन कर रहे थे अतः थोड़ा बहुत लेखन ज्ञान मुझे उनसे भी मिलने लगा था। उस समय छोटे आकार की बाल पाॅकेट पुस्तकें अठन्नी, एक रुपये में आसानी से मिल जाया करती थीं। और हम अपनी पाॅकेटमनी बचाकर जब न तब उन्हें खरीद लाते थे। 

इस तरह से धीरे-धीरे स्कूली पढ़ाई, संगीत और खेलकूद के बाद का हमारा बचा-खुचा समय अब लेखन और पाठन में ही बीतने लगा था। उन दिनों भूत-प्रेत, राक्षसों, राजा-महाराजाओं, जादू-टोने और परियों आदि की कहानियां खूब प्रचलित थीं। अधिकांश बाल पाॅकेट बुक्स की कहानियां इन्हीं सब के इर्द-गिर्द घूमती रहती थीं। जिन्हें पढ़ने में हमें बहुत आनंद आता था। ऐसी कहानियां पढ़ते-पढ़ते उन्हीं दिनों मैंने भी ‘अभागा राजकुमार’ नामक एक 60-70 पृष्ठों की तिलस्मी कहानी की बाल पाकेट बुक तैयार कर ली थी। मैं उसे बाजार में बिकने वाली अन्य पुस्तकों की तरह ही रंग-बिरंगी छपवाकर बाज़ार में बेंचना और ढेर सारे पैसे कमाना चाहता था पर ऐसा संभव कहां था। न किसी प्रकाशक का अता-पता, न प्रकाशन संबंधी कोई जानकारी या तमीज़। 

एक दिन मैं पुस्तकों की अपनी पांडुलिपि लेकर पिता जी के परिचित एक प्रिंटिंग प्रेस के आॅफिस ही पहुंच गया। मेरी व्यथा जानकर प्रेस वाले चाचा जी ने टालने के अंदाज़ में मुझे अगले हफ्ते कागज़ लेकर आने को कहा। फिर क्या था अगले ही हफ्ते मैं बाज़ार से 20-25 बिना रूल वाली काॅपियां खरीद लाया। उनके एक-एक करके पन्ने फाड़े और उन्हें पाकेट बुक्स के आकार में कैंची से छोटे-टुकड़ों में काटकर फिर से प्रेस वाले चाचाजी के आॅफिस जा पहुंचा। मेरे हाथों में काॅपी के कटे-फटे टुकड़े देखकर प्रेस वाले चाचाजी ने अपना माथा ही पकड़ लिया था। बाद में जब उन्होंने प्रेस और पुस्तक प्रकाशन की कुछ प्राथमिक जानकारियां मुझे दीं तब मेरे नासमझ दिल और दिमाग को पता चला कि मैंने काॅपियां फाड़-फाड़ कर अपनी सारी जमा पूंजी बर्बाद कर डाली थी और उसका रिजल्ट भी कुछ नहीं मिलने वाला था। कुछ दिनों बाद माँ-बाबू जी और बड़े भाइयों आदि से मैंने रो-गाकर और डांट खा-खाकर कुछ और पैसे इकट्ठे किये। प्रेस वाले चाचाजी के कहे अनुसार कागज़ खरीदे और पुस्तक की पांडुलिपि लेकर पुनः प्रेस जा पहुंचा। 

प्रेस वाले चाचाजी ने मुझसे महीनों प्रेस के चक्कर लगवाने के पश्चात अंततः लागत के पैसों में ही मेरी पुस्तक छाप कर मेरे हाथों में थमा दी थीं। शायद वह दिन मेरे लिये सबसे अनूठा और आनंदित करने वाला दिन था। यद्यपि पुस्तकें बेंचकर खूब पैसा कमाने का मेरा सपना पूरा नहीं हो सका था। मैंने दो-चार बुक स्टालों के चक्कर लगाये परन्तु मेरी ब्लैक एंड व्हाइट पुस्तक अपनी दुकान पर रखकर कौन दुकानदार भला अपनी दुकान की शोभा खराब करता। काफ़ी मशक्कत के बाद एक-एक रुपये में 5-10 प्रतियां कुछेक जान-पहचान वालों ने खरीदी, बाकी मुफ़्त में ही बंट गईं या इधर-उधर कहीं गुम हो गईं। मेरे ऊँचे इरादों का जनाज़ा बेशक निकल गया था पर इन सबके बावजू़द, मेरा बाल पाॅकेट बुक का लेखक कहलाने का सपना तो पूरा हो ही गया था।  

03 नवम्बर,15 
(शेष अगली किस्त में) 

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

उन्नीसवीं किस्त: बचपन का दशहरा

ता नही तब हमारा बचपन था इसलिये हम प्रत्येक त्यौहार का भरपूर आनन्द उठा पाते थे या उस समय के त्यौहारों की ख़ुशबू ही ऐसी थी कि उनमें कोई भी मदहोश हो जाता था। ख़ैर सच जो भी हो हम उस आनन्द को भला कैसे भूल सकते हैं जिनमें हमारी हर ख़ुशी के समय हमें अपने माता-पिता, भाई-बहनों और प्यारे-प्यारे मित्रों का संग-साथ मिलता था और हम हर त्यौहार का भरपूर आनन्द उठा पाते थे। तब हम हिन्दू-मुस्लिम, सिख या ईसाई नहीं थे। न छोटी जात, न बड़ी जात, न अगड़े और न पिछड़े। हम तो बस अपनी ख़ुशियों में एक-दूसरे को शरीक करने वाले बच्चे भर थे। हम सब मिलकर ही हरेक पर्व का आनन्द उठाते थे। अब से अलग हटकर तब हमारे शहर बहराइच में शहर से दूर रामलीला मैदान में 10 दिन तक भव्य रामलीला का आयोजन होता था। रामलीला मैदान के चारों ओर दर्शक और बीच के पूरे मैदान में विभिन्न पात्रों द्वारा तरह-तरह की वेशभूषा में रामलीला का मंचन। भारी भीड़ के बीच हम रामलीला के एक-एक दृश्य का भरपूर आनन्द उठाते थे। दशमी के दिन बड़ा-सा रावण, ढेर सारी आतिशबाजि़यों के बीच जब   धू-धू करके जलता, तब उसे जलता हुआ देखकर हमें इस बात की तसल्ली होती कि अब दुनिया सेे सारे पाप सदा के लिये मिट जायेंगे।

ऐसे त्यौहारों पर घर से लेकर रामलीला मैदान तक के लम्बे रास्ते पर खेल-खिलौनों और खाने-पीने की सैकड़ों दूकाने होतीं। पूरा परिवार भीड़ के चलते रास्ते भर एक-दूसरे की अंगुली कस कर पकडे़ रहता। रास्ते भर हम कुछ-न- कुछ खाते-पीते, दो-चार रुपये में ही ढेर सारे खिलौने ख़रीदते या बाइस्कोप आदि देखते और त्यौहार का पूरा आनन्द उठाते हुए आते और जाते। हम भीड़ के साथ ही वहां तक पहुंचते और उसी तरह से वापस आते। कभी पैदल तो कभी रिक्शे और कभी इक्के या तांगे पर बैठकर वहां तक पहुंचने का कुछ अलग ही आनन्द मिलता था। उस दिन घर में भी कुछ अलग हट कर पकवान आदि बनते। यही वजह थी कि हमें पूरे साल इन त्यौहारों का इंतज़ार रहता। 

त्यौहारों पर माता-पिता के पास भी हमारे लिये पूरा समय होता। हमें भी लम्बे समय की छुट्टी तो मिलती ही थी, होमवर्क आदि का ऐसा कोई बोझ भी नहीं होता था कि हमें त्यौहार, तनावों के बीच मनाना पड़े या सारा त्यौहार घर में ही बैठकर वाट्सअप या फेसबुक पर एक-दूसरे को शुभकामना संदेश कट-पेस्ट करते हुए ही बीत जाए। त्यौहार पर न कोई नकली व्यवहार था और न कोई काल्पनिक ख़ुशी। तब सब कुछ बस ओरीजनल ही होता था।

22 अक्तूबर,15 
(शेष अगली किस्त में)