रविवार, 1 फ़रवरी 2015

ग्यारहवीं किस्त: न शरारतें घटीं और न पिटाई...

आज से उलट यूं तो कलाकारी और पढ़ाई के साथ मेरा पूरा बचपन ही शरारतों से भरा-पूरा रहा परन्तु जीवन की कुछ शरारतें ऐसी भी रहीं जो आज भी याद आती हैं तो मुझे अपने आप पर कुछ शर्म सी महसूस होने लगती है। वो बात अलग है कि मेरी शरारतें अकेले की नहीं होती थीं और उनमें मेरी मित्र मंडली व मेरे स्व. भाई मुन्ना जी का भी थोड़ा बहुत योगदान रहता था परन्तु प्रायः जब-जब पिटने का नंबर आता तो मैदान में अकेला मैं ही अपने आपको खड़ा पाता। 

उन दिनों पिता जी का पड़ोस के एक छोटे से रेस्टारेंट में खाता चलता था यानी कि आपातकाल में अक्सर वहां से मेहमानों आदि के लिये चाय-नास्ता आता और फिर एक साथ ही महीने भर का हिसाब होता। उस रेस्टोरेंट के समोसे और आलू-बण्डे बहुत प्रसिद्ध थे। 11-12 बजे के आस पास जब वो तैयार होते तब उन्हें खाने वालों की लूट सी मच जाती, ऐसा लगता मानों वह सब फ्री में बंट रहा हो। 

एक दिन हम कुछ सहपाठी स्कूल से जल्दी छूट गये। हम छः दोस्त घर के सामने स्थित पोस्ट ऑफिस की साढ़ियों पर आकर बैठ गये थे। उसी समय जब अचानक हमारी नाकों में पास के रेस्टोरेंट से समोसे और आलू बण्डे के बनने की खुशबू घुसी तो हमारा दिल उन्हें गरमा-गरम खाने को मचल उठा। उस समय हमारे पास में न तो पैसे थे और न ही अपने आपको उन्हें खाने से रोक पाने की ताक़त ही। फिर आखिर हम करते भी क्या। अचानक हमारे दिमाग का कीड़ा कुलबुलाया और हमारे खुराफ़ाती दिमाग ने एक नए आइडिये को जन्म दे डाला। मैंने अपनी कॉपी से आधा पृष्ठ निकाला। उस पर 6 समोसे भेजने की टिप्पणी लिखकर नीचे पिता जी के साइन मार दिये। एक सहपाठी को यह सिखाकर कि यह पर्ची देकर रेस्टोरेंट वाले अंकल से बोलना कि एकाउंटेंट साहब के घर मेहमान आये हैं अतः उन्होंने 6 गरम समोसे तुरन्त मंगवाये हैं, रेस्टोरेंट की ओर भेज दिया । हमारी चाल कामयाब रही और हमें बिना किसी बाधा के गरमागरम समोसे खाने को मिल गये। पर एक-एक समोसे से जब हमारा मन नहीं भरा तो अगली बार मैंने दोस्तों की ताज़ी सलाह पर आलू बण्डे की भी पर्ची काटकर एक दूसरे सहपाठी के हाथों वहां भिजवा दी। हम दूसरी बार भी अपनी योजना में कामयाब हो गये थे। रेस्टोरेंट वाले अंकल को सचमुच यही लगा कि एकाउंटेंट साहब के घर में कोई खास मेहमान आये हुए हैं और उनके ज़ोरदार स्वागत में सभी लगे हुए हैं। पर कहते हैं न कि लालच बुरी बला है। जब तीसरी बार हमने फिर से एक-एक समोसे की चाहत में किसी अन्य सहपाठी को वहां भेजा तो कुछ ही देर में हम सबके होशों के फाकता होने की नौबत आ गई। 

अंतिम बार समोसों के स्थान पर उस लड़के का कान पकड़े रेस्टोरेंट वाले अंकल जी भी हमारे सामने थे। हमारी उस्तादी का कचरा निकल गया था। अपनी पोल-पट्टी खुलने की खबर आते ही हमारे बीच अफ़रा-तफ़री सी मच गई। मौका-ए-वारदात से अन्य सभी तो भाग लिये, पकड़ में आया तो हर  बार की तरह मैं ही। और फिर जब शाम को भरी महफिल में रेस्टोरेंट वाले अंकल के सामने मेरी पेशी हुई तो आगे के हाल का अंदाज़ कोई भी सहज ही लगा सकता है।

01 फरवरी,15 (शेष अगली किस्त में)  

बुधवार, 14 जनवरी 2015

दसवीं किस्त: दूल्हे मियां की ताजपोशी...

धीरे-धीरे हम कुछ बड़े तो हो रहे थे परन्तु बाल सुलभ शैतानियाँ अभी भी हमारे भीतर से जाने का नाम नहीं ले रही थीं। बड़ों की नकल व इधर-उधर की अच्छी-बुरी घटनायें हमें खुद भी वैसा ही करने को प्रेरित करतीं। बेशक बाद में पिटाई भी होती परन्तु हर पिटाई के बाद हम नये सिरे से उठकर अगली शैतानी के लिये तैयार हो जाते थे। एक दिन हम सपरिवार पिताजी के मित्र की लड़की की शादी में गये थे। शादी में दूल्हे-दूल्हन की शान-शौकत, ताज़पोशी और रुतबे को देखकर मैं सबसे अधिक प्रभावित हुआ। बस फिर क्या था अगले ही दिन से मेरे कोमल दिमाग में खुराफात की लहरें हिलारें लेने लगीं। 

एक दिन जब घर के सभी बड़े लोग पड़ोस के साथियों के साथ कोई फिल्म देखने गये थे, हमने अपने घर के अहाते में एक दूसरी ही फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी। मेरे मझले भैया मुन्ना जी पंडित जी बने, मैं दूल्हा और पडा़ेस की बिन्नू (बदला हुआ नाम) दुल्हन। आस-पडा़ेस के कुछ मजे़ लेने वाले मेरे हम साथियों में से कुछ बराती बन गये तो कुछ घराती। दूल्हा-दुल्हन ईंट-पत्थर जोड़कर बनाये गये सोफ़े पर सवार हुए और पंडित जी शादी के मंत्रोच्चारण में व्यस्त हो गये। मैंने कोई कच्ची गोलियां तो खेली नहीं थीं। शादी की सारी रस्में अच्छी तरह से बिना किसी विघ्न के निपट जायें इसका मैंने पहले से ही पक्का इंतज़ाम कर रखा था। बेशक मुझे शादी का अर्थ नहीं मालूम था पर यह ज़रूर पता था कि सात फेरों और मांग में सिंदूर डालने के बाद ही शादी पूर्ण होती है। 

पंडित  बने मुन्ना भैया मंत्रों के स्थान पर अगड़म-बगड़म बोले जा रहे थे और मैं बिन्नू के साथ तेजी से फेरे लेने में व्यस्त था। तेज़ी इसलिये भी थी कि कहीं अधूरे फेरों के बीच कोई लफड़ा न हो जाये और शादी बरबादी में बदल जाये। बिन्नू भी पैर में दर्द के बावज़ूद तेज़ी से चलते हुए मेरा पूरा साथ दे रही थी। परन्तु बुरा हो उस एक साथी का... इधर मैंने बिन्नू की मांग में अपनी मां की सिंदूर की पूरी की पूरी डिबिया उड़ेली और उधर बीच सिनेमा से उठाकर वह मेरी माँ और पापा जी को वहां का दृश्य दिखाने को बुला लाया। माँ और बाबू जी को देखते ही एक ओर मुन्ना भैया जहां अपनी पंडिताई छोड़कर भागे तो वहीं दूसरी ओर सारे घराती और बाराती भी रफूचक्कर हो लिये। पकड़ में आये तो केवल दूल्हा और दुल्हन। दुल्हन तो बेचारी पराई अमानत होने के कारण फिर भी बच गई पर मैं पूरी तरह से लपेटे में आ गया था। उस दिन मेरी जमकर पिटाई हुई। वह शानदार पिटाई और दूल्हे की ताजपोशी का दृश्य मेरी आँखों के सामने तैरकर मुझे उस दिन भी भयभीत किये जा रहा था जब मैं जवान होकर अपनी असली शादी के समय दूल्हन की मांग में सिंदूर भरने को एकदम तैयार खड़ा था।

(शेष अगली किस्त में)  14 जनवरी,2015

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

नौवीं किस्त: जब भीख में मिले पैसों से आया बैंजोे...

उस समय बहराइच के गवर्नमेंट इंटर काॅलेज में पढ़ाई से कई गुना अधिक हमारे गानों की धूम रहती थी। कोई भी फंक्शन हो, छोटा या बड़ा हमें गाने के लिये प्रमुखता से याद किया जाता था। तब कई सहपाठी हमारी गायिकी और प्रसिद्धि की वजह से ही हमसे दोस्ती करने को लालायित रहते थे। पर हम इस बात से अनजान सभी से मित्रता निभाने को खुद भी आतुर रहते थे। 

एक दिन काॅलेज में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का आयोजन हुआ तो संगीत के मास्टर जी ने हमें भिखारी का रोल दिया। तब मैं भी इस चैलेंज को स्वीकारते हुए अपने भाई के साथ भिखारी की ड्रेस में मंच पर कूद पड़ा। भाई के हाथ में एक कटोरा था और मेरे गले में छोटी सी हारमोनियम टंगी हुई थी। परदा खुलते ही जब मैंने एक फूल दो माली फिल्म के गीत की लाइनें ‘कर दे मदद ग़रीब की तेरा सुखी रहे संसार बच्चों की किलकारी से गूंजे सारा घर-बार...औलाद वालों फूलो-फलो... अपनी मधुर आवाज़ (जैसा कि लोग बताते हैं) में शुरू की तो हाॅल तालियों की गड़गड़ाहट से न केवल गूंज उठा बल्कि कई श्रोतागण तो मंच पर आकर हमारी कटोरी में सिक्के व नोट ही डालने लग गयेे। और फिर क्या था देखते ही देखते हमारी कटोरी सिक्कों और रुपयों से भर कर छलकने लगी और स्टेज पर भी चारों ओर सिक्के ही सिक्के नज़र आने लगे। उस दिन हमारी काफी अच्छी कमाई हो गई थी। और बड़ी बात ये भी थी कि भिखारी की वेशभूषा में भी सबने हमें पहचान लिया था। 

अगले दिन संगीत के शौकीन हमारे प्रिंसिपल श्री वसीमुल हसन रिज़वी साहब ने हमें अपने कमरे में बुलाकर जहां सुंदर गीत व अभिनय पर हमें खूब शाबाशी दी वहीं संगीत के मास्टर जी को यह निर्देश भी दिया कि वे आइंदा बच्चों से ऐसे रोल न करायें क्योंकि हो सकता है कि कभी ये बच्चे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या कुछ और ही बन जायें। उन्होंने मास्टर जी को यह भी सलाह दी कि बच्चों को ईनाम (भीख) के पैसे नकद न देकर उन्हें वाद्ययन्त्र खरीदकर दिया जाये ताकि उनका संगीत का शौक भी पूरा होता रहे। 

और तब उन पैसों से हमारे लिये एक सुंदर सा बैंजो बाज़ार से खरीदकर दिया गया, जिसे हम सालों बजाते रहे थे। वह हमारा पहला बड़ा ईनाम था।

(शेष अगली किस्त में)  
13 दिसम्बर,14

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014


आठवीं किस्त

....और गाना गाने सेे पिटाई भी हुई...


बहराइच के जीआईसी में पढ़ते हुए यद्यपि मुझे सभी अध्यापकों का ज़्यादातर प्यार ही मिला और अमूमन मैं ग़ल्तियों और पढ़ाई के प्रति ज़्यादा गंभीर न होने के बावजूद अध्यापकों की डांट व मार खाने से बच जाता था परन्तु हर बार ऐसा ही होता हो, ऐसा भी नहीं था। मेरा जो सुमधुर गायन पिटाई से प्रायः मेरी रक्षा करता था उसने एक बार मुझे अपने अध्यापक जी की खूब मार भी खिलाई। इस प्रकार से अध्यापकों के स्नेह व प्यार के बीच मुझे डांट-मार खाने का सुख भी भोगना पड़ा।

एक दिन की बात है, कक्षा में मास्टर जी को पधारने में कुछ देरी हो गई थी। उनकी देरी का फ़ायदा उठाने के लिये क्लास के सभी बच्चे मनोरंजन के मूड में आ गये थे। शोरगुल के बीच मेरे एक सहपाठी ने सबको शांत करते हुए एनाउंस कर दिया कि आज किशोर श्रीवास्तव शहर के ओंकार टाकीज़ में लगी फिल्म का कोई गीत सबको सुनायेंगे। उसके इतना एनाउंस करते ही कक्षा में और भी ज़्यादा शोर मच गया। सभी मुझ पर गीत गाने का दबाव बनाने लगे। अंततः मुझे उसी फिल्म का एक गीत गाने पर मज़बूर होना पड़ा। गीत की अंतिम लाइन तक पहुंचते-पहुँचते सभी बच्चे ज़ोर-ज़ोर से ताली बजाते हुए मेरी सीट के इर्द-गिर्द आकर इकट्ठे होने लगे थे। शोर की आवाज़ क्लास से बाहर तक चली गई थी। उसी समय हमारी क्लास के पास से अंग्रेजी के अध्यापक श्री शत्रुध्नलाल जी गुज़रे तो उनकी कानों से भी बच्चों की तेज़ आवाज़े जा टकराईं। शोरगुल सुनकर वे छड़ी लिये हमारे रूम में घुस आये। उन्होंने बच्चों को शांत कराते हुए जब उनसे इस भयानक शोर का कारण पूछा तो किसी ने बताया कि क्लास में गाने का कार्यक्रम चल रहा था। इस पर जब उन्होंने डपटकर पूछा कि पढ़ाई करने के समय गाना कौन गा रहा था, तब उसी निगोड़े सहपाठी ने सत्य हरिश्चंद्र बनते हुए सीधा मेरी ओर इशारा कर दिया था, जिसने मुझे उस दिन गाना गाने के लिये सर्वप्रथम बाध्य किया था। और फिर क्या था मास्साब मुझ पर अपनी छन्टी के साथ बरस पड़े थे- ‘क्यों रे पढ़ाई करने की बजाय सभी को गाना सुना रहा था....आ आज तेरा सारा गीत मैं निकालता हूं।’ इस प्रकार उस दिन गाना गाने के कारण क्लास में सभी बच्चों के सामने मेरी जमकर ताजपोशी हुई। और कमाल की बात यह भी रही कि पहले तो क्लास के बच्चों ने जि़द करके मुझसे गीत सुना और फिर बाद में मेरी ताजपोशी का खूब लुत्फ़ भी उठाया।

(शेष अगली किस्त में) 
21 नवम्बर,14

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

सातवीं किस्तः

गायिकी से बचाव

पांचवीं करने के बाद मुन्ना भैया का एडमीशन बहराईच के गवर्नमेंट इंटर कालेज में हो गया था। उस समय (अब का पता नहीं) गवर्नमेंट इंटर कॉलेज पढ़ाई-लिखाई ही नहीं प्रायः हर मामले में सबसे अव्वल हुआ करता था। उसमें प्रवेश की प्रकिया भी उस वक्त के हिसाब से काफी जटिल थी। तब वहां बिना अच्छे नंबर लाये छठी क्लास में एडमीशन मिलना मुश्किल होता था। परन्तु मुन्ना भैया की गिनती उस समय पढ़ाकू छात्रों में होती थी अतः उन्हें उसमें प्रवेश मिलने में कोई खास जददो-ज़हद नहीं करनी पड़ी थी। अगले साल ही घसीट-घसाट के मैं भी राजकीय इंटर कॉलेज में पहुंच गया था। मैं पढ़ाई में मुन्ना भैया की तरह बहुत तेज़ नहीं था पर रट्टू तोता होने के कारण प्रवेश परीक्षा निकाल ले गया था। तब की पढ़ाई आज की तरह इतनी दुरूह भी नहीं थी। छठी कक्षा में हमें एक बार फिर से ए बी सी डी व क ख ग घ की रट लगानी पड़ी। जीआईसी में पहले साल से ही सुमधुर गायन के कारण मेरी व मुन्ना भैया की तूती बोलने लगी थी। यद्यपि मुन्ना भैया की आवाज़ मुझसे कहीं अधिक अच्छी थी परन्तु मुझे अपनी पतली और मीठी आवाज़ का ज्यादा फायदा मिला और कॉलेज में मेरी गिनती अव्वल दर्जे के गवैये के रूप में होने लगी थी। बताते हैं कि उस समय पतली व मधुर आवाज़ होने के कारण लोग मुझे जुनियर लता के नाम से जानने लगे थे। छठी में एक विषय के रूप में हमने संगीत विषय भी लिया था। श्रीवास्तव मास्साब हमें संगीत सिखाते थे। कॉलेज में जब भी कोई संगीत या नाटक का कार्यक्रम होता हमें क्लास से बुलवा लिया जाता। स्कूलों की जनपदीय युवक समारोह और संगीत की प्रतियोगिताएं के अवसर पर तो प्रायः हम कई-कई दिनों तक कक्षा से गायब रहकर गाने-बजाने के रिहर्सल में ही लगे रहते थे। ऐसे में पढ़ाई से कुछ दिनों के लिये छुटकारा पाकर मुझे खासकर काफी राहत मिलती थी। मुझे गाने में अव्वल रहने का एक फायदा और मिलता था। मेरे अध्यापकगणों की मुझ पर विशेष कृपा रहती थी। मैं अपना होमवर्क करके न लाऊं या किसी सवाल का सही जवाब न दे पाऊं तो इन्हीं बातों पर पूरी क्लास पिट जाती थी पर मैं बचा रह जाता था। बच्चों की गलतियों पर पिटाई करते समय हिंदी के श्रीवास्तव मास्साब और गणित के जायसवाल मास्साब (शायद यही नाम था) प्रायः मेरे विपरीत के कोने से बच्चों की पिटाई करना शुरू करते। अक्सर मेरा नंबर आने तक या तो अगले क्लास के लिय घंटा बज जाता या मेरी मासूम शक्ल पर अध्यापकद्वय को तरस आ जाता अथवा यूं कहिये कि मेरी गायिकी का प्रभाव। मेरे द्वारा समर्पण की मुद्रा और दयनीय सूरत बनाते हुए हाथ आगे किये जाने पर भी उनकी छड़ी बीच राह में ही रुक जाती थी। और मैं प्रायः हर बार पिटने से बचा रह जाता था।           

23 अक्तूबर,14
(शेष अगली किस्त में)  

रविवार, 7 सितंबर 2014

छठी किस्तः उपहास का पात्र

....स्कूल की पढ़ाई के अलावा एक मास्टर जी हमें घर पर भी पढ़ाने आते थे। वह मुस्लिम थे परन्तु तब हमें वहां इन सब बातों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता था कि कौन किस जाति व धर्म का है। हमारे लिये सभी लोग लगभग बराबर ही थे। क्योंकि साथ-साथ खेलने-कूदने व पढ़ने, लिखने के दौरान हमें इन सब बातों की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत ही नहीं रहती थी। पर मैं साफ़तौर पर यह नहीं कह सकता हां, इतना ज़रूर याद पड़ता है कि घर में सभी तरह के लोगों का आना-जाना निरन्तर बना रहता था। और कहीं कोई किसी तरह की खा़स पाबंदी भी नहीं थी।

घर के मास्टर जी एक साथ आस-पड़ोस के कई बच्चों को पढ़ाते थे। घर के बाहर हाते के भीतर ही सभी बच्चे एकत्र हो जाते और मास्टर जी अलग-अलग क्लास के बच्चों को एक साथ पढ़ाना शुरू कर देते। कुर्सी बस मास्टरजी के लिये होती थी। बच्चे दरी या चटाई पर ही बैठते थे। मास्टर जी पढ़ाई के साथ-साथ सभी बच्चों को अक्सर अच्छी-अच्छी कहानियां भी सुनाते थे। और वक़्त-ज़रूरत, उनकी छड़ी भी हमारी पीठ या हथेली को लाल कर जाती थी। तब आज की तरह माता-पिता को मास्टरजी द्वारा हमें पीटे जाने पर कोई आपत्ति नहीं होती थी। अलबत्ता कभी-कभी हमारे द्वारा होमवर्क पूरा न किये जाने या किसी गंभीर शैतानी पर उनकी ओर से घुमा कर दो-चार और जड़ने की फ़रमाइश भी आ जाती। तब की एक बात और भी उल्लेखनीय थी कि मास्टर जी भी बगै़र भेदभाव के हमारी पढ़ाई व पिटाई पर एक समान ध्यान देते थे। ऐसे में हमारी जान-पहचान या उनके लिये चाय-पानी का इंतज़ाम करना भी कभी इन सबके आड़े नहीं आता था। 

एक रोज़ जब उन्होंने एक बच्चे को पढ़ाई के दौरान ज़्यादा शरारत करने व अकड़ दिखाने पर डांटा-फटकारा व अंत में पीट भी डाला तब बच्चे के माता-पिता ने भी बजाय बच्चे को बचाने के स्वयं भी उसे दो-चार थप्पड़ रसीद कर दिये। और जब दिन-प्रतिदिन उसकी शरारत बढ़ती गई तो एक दिन उसे हाते में लगे अमरूद के पेड़ पर रस्सियों से उल्टा लटकने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। हालांकि बाद में इस मारा-मारी के दौरान उसके कानों से खून बहने पर मास्टर जी को बहुत अफ़सोस हुआ और उन्होंने प्राथमिक उपचार के साथ उसे प्यार से पुचकारा-दुलारा भी था। 

अक्सर मास्टर जी जब बच्चों को पढ़ाने बैठते तब उनसे उनका हाल-समाचार आदि भी पूछ बैठते। एक दिन उन्होंने जब सभी बच्चों से बारी-बारी से यह पूछा कि उन्होंने आज क्या खाया है तो सभी ने बढ़चढ़कर अपने खाने-पीने का बखान कर डाला। किसी ने मलाई-कोफ़्ते, किसी ने पूड़ी-पुलाव और किसी ने छोले-पराठे या मटन-बिरयानी खाने की बात कही। जब मेरा नंबर आया तब मैं संकोच में पड़ गया। अंत में जब मैंने झिझकते-झिझकते बताया कि आज मैंने खिंचड़ी खाई है, तो सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े। उस समय सच् का बखान करने पर मुझे सबके उपहास का पात्र बनना पड़ा था। बेशक मास्टर जी ने सबको डांटकर चुप करा दिया था पर मैं क़ाफ़ी देर तक यह सोचता रह गया था कि मुझे सच ही बोलना चाहिये था या सबकी तरह से अपनी बात को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करना चाहिये था।

07.09.2014 

(शेष अगली क़िस्त में...)


रविवार, 31 अगस्त 2014

पांचवी किस्तः नमकीन और हलुवा

बचपन में हम जिन दांव-पेचों, नफा-नुकसान व चालाकियों आदि से मसरूफ होते हैं वो हमें समय के साथ-साथ अपने आस पास के परिवेश से स्वतः ही मिलती चली जाती हैं। बहराइच के उस सरकारी प्राइमरी स्कूल में धीरे-धीरे हमारा मन रमने लगा था। बेशक ये सदियों पुरानी बात न हो पर उन दिनों बहराइच जैसे छोटे से शहर में आज जैसे अंग्रेजी माध्यम वाले पब्लिक स्कूल नहीं थे। शिशु मंदिर व मांटेंसरी स्कूलों की गिनती ही खासे स्कूलों में होती थी। पर घर के नज़दीक होने व किन्हीं अन्य कारणों के चलते हम सरकारी स्कूल में ही रच-बस गये थे। हमारा मन वहीं रमने लगा था। तब आज की तरह शायद ऐसी होड़ भी नहीं थी कि बच्चों को किसी महंगे प्राइवेट स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाया जाये। उस दिन स्कूल के बच्चे बहुत खुश थे। शायद कोई फंक्शन था। हमें कोई अच्छा सा देशभक्तिपूर्ण गीत गाने को बोला गया था। सो हमने उसकी अच्छी खासी तैयारी भी कर ली थी। एक दिन पहले ही हमें बताया गया था कि अगले दिन सभी बच्चों को खाने के लिये स्कूल में नमकीन और हलुवा मिलेगा। सभी बच्चे इस बात को लेकर बहुत खुश थे। अगले दिन कुछ बच्चे तो घर से बिना कुछ खाये-पिये ही चले आये थे। स्कूल में नमकीन और हलुवा जो बंटना था। मेरा ध्यान भी गाना गाने से ज़्यादा नमकीन और हलुवे की ओर था। 

उस दिन एक मास्टर जी ने हमारे घर से एक-दो किलो के करीब नमक भी मंगवाया था। सो हमने बिना किसी हील-हुज्जत के उन्हें नमक की पोटली लाकर दे दी थी। उन दिनों नमक पैकेट में नहीं बल्कि नमक की डलियों के रूप में खुले में मिलता था। फंक्शन वाले दिन स्कूल में कुछ ज़्यादा ही भीड़ थी। जो बच्चे अक्सर कक्षा से गायब रहते थे वह भी उस दिन स्कूल आये हुए थे। मेरे भैया मुन्नाजी, मैं खुद और कुछ अन्य सुरीले बच्चे गाना गाने को एकदम तैयार बैठे थे। कार्यक्रम में सभी गायकों की सहपाठियों व शिक्षकों द्वारा खूब तारीफ की गई। पर उस दिन हेड मास्टर साहब के न होने की हमें काफी कमी खली थी। कार्यक्रम में वह होते तो हमें और भी अच्छा लगता क्योंकि उन्हें हमारी कला से बहुत प्यार था।

कार्यक्रम के समापन की घोषणा के साथ ही सभी बच्चों को लाइन में लग कर नाश्ता लेने को कह दिया गया था। सभी बच्चे धक्का-मुक्की और शोरगुल करते हुए लाइन में लग गये थे। और अंततः वह घड़ी आ ही गई जिसका हम सभी बच्चों को पिछले दिनों से काफी इंतज़ार था। सभी के हाथों में बारी-बारी से हलुवे की पत्तलें थमाई जाने लगी थीं। हालॉकि कहे अनुसार नमकीन का पत्तल कहीं भी नहीं दिख रहा था। जिन बच्चों को पत्तलें पकड़ा दी गई थीं उनमें से ज़्यादातर बच्चे तेजी से अपनी-अपनी पत्तलें लिये अपने-अपने घरों की ओर भाग गये थे। कुछ बच्चे हलुवे की पत्तलें पाकर खुश नहीं दिखाई पड़ रहे थे और ज़रा सा चख कर ही उन्होंने अपनी पत्तलें इधर-उधर फेंकना शुरू कर दिया था। जब हमारा नंबर आया तो हलुवा चखते ही हमारा मन भी खराब हो गया था। हलुवे में चीनी की बजाय नमक पड़ा हुआ था। और वह बेस्वाद लग रहा था। जब हमने दबी ज़ुबान से इसके बारे में पड़ताल की तो मालूम पड़ा कि हम बच्चों तक शायद ग़लत सूचना पहुंची थी। किसी ने बताया कि नाश्ते में नमकीन और हलुवे की बजाय नमकीन यानी नमक मिला हलुवा बंटने की बात कही गई थी। 

उस समय सूजी से आज की तरह उपमा जैसी डिश बनाने का प्रचलन भी नहीं था। फिर उतने सस्ते ज़माने में भी बच्चों के साथ ऐसा क्यों किया गया। वह किसी भ्रष्टाचार का अंग था या बच्चों के साथ कोई मज़ाक...? बच्चों के नन्हें दिमाग में इन बातों का अर्थ आ पाना मुश्किल था, उन दिनों।

31.08.2014                                                                                                         

शेष अगली किस्त में....