रविवार, 7 सितंबर 2014

छठी किस्तः उपहास का पात्र

....स्कूल की पढ़ाई के अलावा एक मास्टर जी हमें घर पर भी पढ़ाने आते थे। वह मुस्लिम थे परन्तु तब हमें वहां इन सब बातों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता था कि कौन किस जाति व धर्म का है। हमारे लिये सभी लोग लगभग बराबर ही थे। क्योंकि साथ-साथ खेलने-कूदने व पढ़ने, लिखने के दौरान हमें इन सब बातों की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत ही नहीं रहती थी। पर मैं साफ़तौर पर यह नहीं कह सकता हां, इतना ज़रूर याद पड़ता है कि घर में सभी तरह के लोगों का आना-जाना निरन्तर बना रहता था। और कहीं कोई किसी तरह की खा़स पाबंदी भी नहीं थी।

घर के मास्टर जी एक साथ आस-पड़ोस के कई बच्चों को पढ़ाते थे। घर के बाहर हाते के भीतर ही सभी बच्चे एकत्र हो जाते और मास्टर जी अलग-अलग क्लास के बच्चों को एक साथ पढ़ाना शुरू कर देते। कुर्सी बस मास्टरजी के लिये होती थी। बच्चे दरी या चटाई पर ही बैठते थे। मास्टर जी पढ़ाई के साथ-साथ सभी बच्चों को अक्सर अच्छी-अच्छी कहानियां भी सुनाते थे। और वक़्त-ज़रूरत, उनकी छड़ी भी हमारी पीठ या हथेली को लाल कर जाती थी। तब आज की तरह माता-पिता को मास्टरजी द्वारा हमें पीटे जाने पर कोई आपत्ति नहीं होती थी। अलबत्ता कभी-कभी हमारे द्वारा होमवर्क पूरा न किये जाने या किसी गंभीर शैतानी पर उनकी ओर से घुमा कर दो-चार और जड़ने की फ़रमाइश भी आ जाती। तब की एक बात और भी उल्लेखनीय थी कि मास्टर जी भी बगै़र भेदभाव के हमारी पढ़ाई व पिटाई पर एक समान ध्यान देते थे। ऐसे में हमारी जान-पहचान या उनके लिये चाय-पानी का इंतज़ाम करना भी कभी इन सबके आड़े नहीं आता था। 

एक रोज़ जब उन्होंने एक बच्चे को पढ़ाई के दौरान ज़्यादा शरारत करने व अकड़ दिखाने पर डांटा-फटकारा व अंत में पीट भी डाला तब बच्चे के माता-पिता ने भी बजाय बच्चे को बचाने के स्वयं भी उसे दो-चार थप्पड़ रसीद कर दिये। और जब दिन-प्रतिदिन उसकी शरारत बढ़ती गई तो एक दिन उसे हाते में लगे अमरूद के पेड़ पर रस्सियों से उल्टा लटकने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। हालांकि बाद में इस मारा-मारी के दौरान उसके कानों से खून बहने पर मास्टर जी को बहुत अफ़सोस हुआ और उन्होंने प्राथमिक उपचार के साथ उसे प्यार से पुचकारा-दुलारा भी था। 

अक्सर मास्टर जी जब बच्चों को पढ़ाने बैठते तब उनसे उनका हाल-समाचार आदि भी पूछ बैठते। एक दिन उन्होंने जब सभी बच्चों से बारी-बारी से यह पूछा कि उन्होंने आज क्या खाया है तो सभी ने बढ़चढ़कर अपने खाने-पीने का बखान कर डाला। किसी ने मलाई-कोफ़्ते, किसी ने पूड़ी-पुलाव और किसी ने छोले-पराठे या मटन-बिरयानी खाने की बात कही। जब मेरा नंबर आया तब मैं संकोच में पड़ गया। अंत में जब मैंने झिझकते-झिझकते बताया कि आज मैंने खिंचड़ी खाई है, तो सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े। उस समय सच् का बखान करने पर मुझे सबके उपहास का पात्र बनना पड़ा था। बेशक मास्टर जी ने सबको डांटकर चुप करा दिया था पर मैं क़ाफ़ी देर तक यह सोचता रह गया था कि मुझे सच ही बोलना चाहिये था या सबकी तरह से अपनी बात को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करना चाहिये था।

07.09.2014 

(शेष अगली क़िस्त में...)


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