मंगलवार, 7 जुलाई 2015

पन्द्रहवीं किस्तः अधूरी फिल्में पूरा मज़ा...

हराइच में हमारे सरकारी क्वार्टर के सामने तब बच्छराज-बाबूलाल की बड़ी सी कोठी हुआ करती थी। घर के एकदम बगल में एक ओर जय हिंद कोठी; जिसमें नीचे थोक कपड़ों की अनेक दूकानें और ऊपर कोठी के मालिक तथा अनेक किरायेदारों का बसेरा था। घर के एक ओर बड़े से अहाते में सुन्दर सा ओंकार टाकीज बना हुआ था। यह सिनेमाहाल उसके मालिक के नाम पर ही था, जिन्हें हम ओंकार चाचा के नाम से जानते थे। सिनेमाहाल के अहाते में ही एक छोटी सी दुमंजिली मार्केट भी थी। ऊपर लाज और नीचे पान, चाय-नाश्ते आदि की दूकानों के अलावा एक छोटा सा बुकस्टाल भी था, जहां अमूमन फिल्मी किताबें या पत्रिकायें मिलती थीं। किस्सा तोता मैना, राशिफल, तीज-त्यौहारों की जानकारी वाली पुस्तकों और गुलशन नंदा आदि जैसे प्रसिद्ध लेखकों के उपन्यासों के अलावा वहां दो-दो, चार-चार पन्नों वाली फिल्मी गीतों की फोल्डरनुमा पुस्तकें भी मिलती थीं। हम (मैं और मेरे मुन्ना भैया) अक्सर उन्हीं को खरीदकर उनसे नये-नये गीत याद करते थे। 

अन्य लोगों की तरह ही ओंकार चाचा भी  हमारी गायिकी से सदा प्रभावित रहते थे। इसी कारण अक्सर उनकी मेहरबानी से हमें उनके सिनेमाहाल में चल रही नयी-नयी फिल्मों के कुछ टुकड़े मुफ्त में देखने को मिल जाते थे। उन टुकड़ों में ज़्यादातर वो गाने होते थे, जो हमें गाने के लिये तैयार करने होते थे। सिनेमाहाल में धुसने की शर्त यह होती थी कि हमें बाहर निकलकर पहले ओंकार चाचा को वह गाना गाकर सुनाना होगा। 

अक्सर जब हम सिनेमाहाल में कोई गाना या सीन देखने को घुसते, तब हमारा मन वहां ऐसा रम जाता कि सिनेमाहाल से बहार निकलने का मन ही नहीं होता था। हमें लगता था कि हम पूरा सिनेमा देखकर ही बाहर निकलें पर बुरा हो गेटकीपर रफ़ीक (शायद यही नाम था) अंकल का जो गाना खत्म होते ही हमें सिनेमाहाल से दूंढ़कर बाहर निकाल लाते थे। कई बार जब वह हमें सिनेमाहाल से बाहर निकालने के लिये अंधेरे में टार्च दिखाते हुए भीतर प्रवेश करते, तो हमारी घिघ्घी ही बंध जाती थी और हम उनकी पकड़ में आने के डर से अंधेरे में छिपने की कोशिश करने लगते पर कामयाबी अक्सर उन्हीं के हाथ लगती। अंततः वह हमें खोज ही लेते और पूरी फिल्म देखने के हमारे मनसूबे पर पानी फिर जाता। हम उन्हें मन ही मन गरियाते ज़रूर परन्तु इसमें उनका भी दोष नहीं होता था, दरअसल उन्हें तो पिताजी और ओंकार चाचा की ओर से ही आदेश मिला होता था कि हमें सिनेमाहाल में ज़्यादा पसरने का मौका न दिया जाये। इसके बावजूद हम टुकड़े-टुकड़े में ही सही हफ्ते-दो हफ्ते में पूरी फिल्म का मजा उठा ही लेते थे..
07 जुलाई,15         (शेष अगली किस्त में)   

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